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राम और सीता

राम ज्ञान स्वरूप और सीता जी भक्ति स्वरुप है
राम का अर्थ है-रमण करना, लीला करना.एक अन्य पंक्ति में कहा गया है-वह जो सब के हृदय में रमण कर रहे हैं, राम हैं.राम शब्द संस्कृत के २ धातुओं "रम(रमना या घुल जाना )"और "घम(ब्रह्माण्ड या अनंत )"के संयोग से बना है.ब्रह्माण्ड में समाहित परम सत्ता जो कबीर के राम हैं और तुलसी के राम दशरथनंदन हैं.योगी जिस सत्ता में रमते हैं वो ही राम हैं
रमन्ते योगिनिअस्मिन सा रामं उच्यते
राम नाम का एक अन्य अर्थ स्वयं रामायण में ही दिया हुआ है-राम वह सच्चिदानंद ब्रह्म हैं, जिनमें समस्त योगी सदैव रमण करते हैं.राम सब को सुख प्रदान करने वाले भी हैं.क्या हमने कभी सोचा है,वह कौन है जो सभी को सुख दे सकता है?क्योकि सुख की परिभाषा सभी के लिए एक जैसी नहीं है,सभी के लिए अलग अलग है.
हम किसी बच्चे से यह प्रश्न पूछेंगे तो वह कहेगा - "खिलौने".पर वही खिलौना किसी दूसरे के लिए या यू कहे हमारे लिए तो सुख नहीं दे रहा न, किसी व्यक्ति से पूंछे तो वह कोई अन्य भोग्य पदार्थ या धन का नाम ले सकता है, लेकिन एक वस्तु सब के लिए सुख नहीं दे सकती,
लेकिन सचमुच जो सबको सुख देता है वह है आनंद.खिलौने, कोई खेल, घर या बहुत से रुपये-पैसे सुख नहीं है, क्योकि संत जन कहते है जिसके पास जो होगा वह वही देता है,जिसके पास खुशी होगी वही खुशी देगा जिसके पास दुःख होगा वह दुःख देगा वस्तुओ निर्जीव है उनके पास न खुशी है न दुःख.
हाँ उन्हें देखकर हमारे अंदर खुशी या दुःख पैदा होता है पर इस तरह तो सुख और दुःख हम ही पैदा कर रहे है वास्तव में यही सच है हम ही सुख दुःख पैदा करने वाले है अपने विचारों से, मन से. मन में अविवेक आया, अविद्या आई, तो हम दुखी हो गए.
सुख वह है जो आनंद हम इन वस्तुओं से प्राप्त करते हैं.इसलिए तुलसीदास कहते हैं, वह सुखसागर, जिसकी एक नन्हीं बूंद से समस्त लोक आनंदित जो जाता है, और सुख के लिए समस्त लोक जिस पर आश्रित है, वह रामचंद्र हैं.
राम आनंदस्वरूप हैं, सुख का मूल हैं, सत् चित् आनंद हैं, वे हमारे हृदय में रमणशील हैं.इसलिए जिन राम के चरित्र का हम रामायण में अध्ययन करते हैं, वे वास्तव में हमारा अपना"विशुद्ध आत्मस्वरूप"है.और सीता कौन हैं, जिनसे राम ने विवाह किया था? वे साक्षात् शांति हैं, विदेहसुता हैं, सहचारिणी हैं, परमशांति हैं, हमारे आनंदस्वरूप की नित्यसंगिनी हैं.अयोध्या हमारा हृदय प्रदेश है जहां शांति और आनंद एक साथ रहते हैं.
रामायण की कथा में, रावण और कुंभकर्ण का वध करने के लिए रामचंद्र जी को समुद्र लांघना पडा था.यह समुद्र अविद्या और अविवेक का महासागर है, अपने भीतर स्थित शत्रुओं को नष्ट करने के लिए हमको यह पार करना ही पडेगा.रुचि, अरुचि, इच्छा, क्रोध ये सब अंत:करण स्थित हमारे शत्रु हैं.अपने हृदय से इन वृत्तियों को निकाल देंगे तभी हमें पूर्ण शांति की प्राप्ति हो सकेगी.
राम को ज्ञान का स्वरूप और सीता जी को भक्ति भी कहा जाता है.रावण अविद्या, अविवेक, अहं और अभिमान का प्रतीक है, जिसका वध केवलराम ही कर सकते हैं,क्योंकि वे विशुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं.लक्ष्मण वैराग्य,भरत प्रेम और शत्रुघ्न निष्काम सेवा के अवतार हैं.

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