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श्री राम का सात शब्दों वाला तारक महामंत्र

श्री राम का सात शब्दों वाला तारक
महामंत्र

सौभाग्य और सुख देता है राम का तारक मंत्र...
'श्री राम जय राम जय जय राम' - यह सात
शब्दों वाला तारक मंत्र है। साधारण से दिखने वाले इस मंत्र में
जो शक्ति छिपी हुई है, वह अनुभव का विषय है। इसे
कोई भी, कहीं भी,
कभी भी कर सकता है। फल बराबर
मिलता है।
हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य आज यही है कि हम राम
नाम का सहारा नहीं ले रहे हैं। हमने
जितना भी अधिक राम नाम को खोया है, हमारे
जीवन में
उतनी ही विषमता बढ़ी है,
उतना ही अधिक संत्रास हमें मिला है। एक सार्थक नाम
के रुप में हमारे ऋषि-मुनियों ने राम नाम को पहचाना है। उन्होंने इस
पूज्य नाम की परख की और नामों के आगे
लगाने का चलन प्रारंभ किया।
प्रत्येक हिन्दू परिवार में देखा जा सकता है कि बच्चे के जन्म में राम
के नाम का सोहर होता है। वैवाहिक आदि सुअवसरों पर राम के
गीत गाए जाते हैं। राम नाम को जीवन
का महामंत्र माना गया है।
राम सर्वमय व सर्वमुक्त हैं। राम
सबकी चेतना का सजीव नाम हैं। अस समर्थ
रघुनायकहिं, भजत जीव ते धन्य॥ प्रत्येक राम भक्त के
लिए राम उसके हृदय में वास कर सुख सौभाग्य और सांत्वना देने वाले
हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिख
दिया है कि प्रभु के जितने भी नाम प्रचलित हैं, उन सब
में सर्वाधिक श्री फल देने वाला नाम राम
का ही है।
यह नाम सबसे सरल, सुरक्षित तथा निश्चित रुप से लक्ष्य
की प्राप्ति करवाने वाला है। मंत्र जप के लिए आयु,
स्थान, परिस्थिति, काल, जात-पात
आदि किसी भी बाहरी आडम्बर
का बंधन नहीं है। किसी क्षण,
किसी भी स्थान पर इसे जप सकते हैं।
जब मन सहज रूप में लगे, तब ही मंत्र जप कर लें।
तारक मंत्र 'श्री' से प्रारंभ होता है। 'श्री'
को सीता अथवा शक्ति का प्रतीक
माना गया है। राम शब्द 'रा' अर्थात् र-कार और 'म' मकार से मिल कर
बना है। 'रा' अग्नि स्वरुप है। यह हमारे दुष्कर्मों का दाह
करता है। 'म' जल तत्व का द्योतक है। जल
आत्मा की जीवात्मा पर विजय का कारक है।
इस प्रकार पूरे तारक मंत्र - 'श्री राम, जय राम, जय जय
राम' का सार निकलता है - शक्ति से परमात्मा पर विजय। योग शास्त्र
में देखा जाए तो 'रा' वर्ण को सौर ऊर्जा का कारक माना गया है। यह
हमारी रीढ़-रज्जू के दाईं ओर स्थित
पिंगला नाड़ी में स्थित है।
यहां से यह शरीर में पौरुष ऊर्जा का संचार करता है।
'मा' वर्ण को चन्द्र ऊर्जा कारक अर्थात स्त्री लिंग
माना गया है। यह रीढ़-रज्जू के बांई ओर स्थित
इड़ा नाड़ी में प्रवाहित होता है।
इसीलिए कहा गया है कि श्वास और निश्वास में निरंतर
र-कार 'रा' और म-कार 'म' का उच्चारण करते रहने से दोनों नाड़ियों में
प्रवाहित ऊर्जा में सामंजस्य बना रहता है। अध्यात्म में यह
माना गया है कि जब व्यक्ति 'रा' शब्द का उच्चारण करता है तो इसके
साथ-साथ उसके आंतरिक पाप बाहर फेंक दिए जाते हैं। इससे
अंतःकरण निष्पाप हो जाता है।

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