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रावणेश्वर की कथा

रावणेश्वर की कथा


 रावण शिव भक्त था, वह बार-बार कैलाश जाकर शिवजी की पूजा करता था.एक बार उसने सोचा क्यों न शंकर भगवान को लंका ले आऊ, ताकि बार-बार लंका न जाना पड़े. इसी प्रयोजन से उसने कैलाश पर जाकर कठोर तपस्या की. सर्दी-गर्मी-वर्षा में अटल रह कर कठोर ताप किया, इस पर भी शिवजी प्रसन्न नहीं हुए तो अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने शिवजी को लंका ले जाने का आग्रह किया. शिवजी ने एक लिंग उत्पन्न करके कहा इसे तुम लंका ले जाओ, मगर ध्यान रहे रास्ते में यह भूमि को न छूने पाए,अन्यथा वापस नहीं उठेगा. यह कहकर शंकर भगवान उस लिंग में समाहित हो गए. रावण इच्छित फल पा कर खुश हुआ व लिंग को उठाने चला. उसी समय आकाशवाणी हुई कि रावण इसे उठाने से पहले आचमन कर लेना चाहिए. रावण ने भी यह उचित समझा व आचमन करके शिव लिंग उठाकर लंका की और चला.
रास्ते में लंका की और चलता रहा. जब वह आगे बढ़ा तो उसे लघु शंका की शिकायत हुई. मगर शिवजी की बात ध्यान में आने पर वह चलता रहा, मगर जब असहनीय हो गया तो उसने इधर-उधर देखा तो एक ब्राह्मण नजर आया.(ब्राह्मण के वेश में विष्णु भगवान थे. और आचमन कराने की भी देवताओं की चाल थी.) उस लिंग को ब्राह्मण को सोंपकर रावण लघुशंका करने चला गया वहां उसे काफी समय लगा. उधर उस ब्राह्मण ने उस लिंग की स्थापना कर दी,यह वही स्थान था, जहाँ सती का ह्रदय गिरा था,यानि 52 में से एक शक्तिपीठ था. रावण वापस आया तो शिवलिंग को धरती पर पाया. उसने लाख यत्न किया उसे उठाने का, मगर शिवलिंग नहीं हिला.अंत में रावण ने क्रोध में भरकर सोचा अगर मेरे साथ लंका नहीं जायोगे तो यहाँ भी नहीं रहोगे,उसने जोर लगाकर उसे पाताल में भेजना चाहा मगर लिंग थोडा टेड़ा होकर रह गया.

उसी समय उस लिंग पर शंकर भगवान प्रगटे और रावण से बोले, रावण इस जगह मैं तुम्हारे कारण हूँ. अतः जो भी मेरी पूजा करेगा वह तुम्हारी भी पूजा करेगा. मेरे साथ तुम्हारा भी नाम रहेगा. इस प्रकार रावण संतुष्ट हो गया. वह वहां से गंगाजी तक गया व जल भरकर कांवर लाया व शिव लिंग पर चढ़ाया. उस समय सावन का महिना था. अतः कांवर प्रथा की शुरुआत यहीं से हुई बताते हैं. रावण ने वहीँ पर चंद्र्कूप का निर्माण किया व सब नदियों का पवित्र जल लाकर उसमें डाला व शिवजी का जलाभिषेक किया. शिवलिंग की पूजा करके रावण लंका चला गया. इस प्रकार रावणेश्वर धाम बना. अब यह वैद्यनाथ कैसे बना इसकी अलग कहानी है.

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