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ब्राह्मण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:

ब्राह्मण के कर्त्तव्य, कर्म और गुण:


अध्यापनमध्ययनम् यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहम् चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् --मनुस्मृति अध्याय-1
शमोदमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानम् विज्ञानमास्तिक्यम् ब्रह्मकर्मस्वभावजम् -- गीता अध्याय-18, श्लोक-42
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति विद्यातपोभ्याम् भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति -- मनुस्मृति अध्याय-5

अर्थात् ब्राह्मण वर्णस्थ मनुष्यों में निम्नलिखित 15 कर्म और गुण अवश्य होने चाहिए:

१) वेदादि ग्रन्थ पढना
२) वेदादि ग्रन्थ पढाना
३) यज्ञ करना
४) यज्ञ कराना
५) दान देना
६) दान लेना (किन्तु प्रतिग्रह लेना नीच-कर्म है)
७) शम = मन से बुरे कार्य की इच्छा भी न करनी और उसको अधर्म में कभी प्रवृत्त न होने देना
८) दम = चक्षु और श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अन्यायाचरण से रोककर धर्म में चलाना
९) तप = सदा ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय होके धर्मानुष्ठान करना
१०) शौच = शरीर आदि की पवित्रता (पानी से शरीर, ज्ञान से बुद्धि, सत्य से मन, विद्या-तप से जीवात्मा की शुद्धि)
११) क्षान्ति = निन्दा-स्तुति, सुख-दुःख, शीतोष्ण, क्षुधा-तृषा, हानि-लाभ, मान-अपमान आदि हर्ष-शोक छोड़कर धर्म में दृढ-निश्चय रखना
१२) आर्जव = कोमलता, निरभिमान, सरलता
१३) ज्ञानम् = वेदादि शास्त्रों को सांगोपांग पढ़कर, पढ़ाने का सामर्थ्य, सत्य-असत्य का निर्णय
१४) विज्ञान = पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों को विशेषता से जानकार उनसे यथायोग्य उपयोग लेना।
१५) आस्तिक्य = कभी वेद, ईश्वर, मुक्ति, पूर्व-परजन्म, धर्म, विद्या, सत्संग की निन्दा कभी न करना और माता, पिता, आचार्य और अतिथियों की सेवा को न छोड़ना

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