सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलिः ध्यानम्

श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशत नामावलिः
ध्यानम्
1.   - प्रकृत्यै नमः
2.   - विकृत्यै नमः
3.   - विद्यायै नमः
4.   - सर्वभूत-हितप्रदायै नमः
5.   - श्रद्वायै नमः
6.   - विभूत्यै नमः
7.   - सुरभ्यै नमः
8.   - परमात्मिकायै नमः
9.   - वाचे नमः
10. - पद्मालयायै नमः
11. - पद्मायै नमः
12. - शुचयै नमः
13. - स्वाहायै नमः
14. - स्वधायै नमः
15. - सुधायै नमः
16. - धन्यायै नमः
17. - हिरण्मय्यै नमः
18. - लक्ष्मयै नमः
19. - नित्यपुष्टायै नमः
20. - विभावयै नमः
21. - अदित्यै नमः
22. - दित्यै नमः
23. - दीप्तायै नमः
24. - वसुधायै नमः
25. - वसुधारिण्यै नमः
26. - कमलायै नमः
27. - कान्तायै नमः
28. - कामाक्ष्यै नमः
29. - क्रोधसंभवायै नमः
30. - अनुग्रहप्रदायै नमः
31. - बुद्धयै नमः
32. - अनघायै नमः
33. - हरिवल्लभायै नमः
34. - अशोकायै नमः
35. - अमृतायै नमः
36. - दीप्तायै नमः
37. - लोकशोक विनाशिन्यै नमः
38. - धर्म-निलयायै नमः
39. - करुणायै नमः
40. - लोकमात्रो नमः
41. - पद्प्रियायै नमः
42. - पद्महस्तायै नमः
43. - पद्माक्ष्यै नमः
44. - पद्मसुन्दर्यै नमः
45. - पद्माद्भवायै नमः
46. - पद्ममुख्यै नमः
47. - पद्मनाभप्रियायै नमः
48. - रमायै नमः
49. - पद्ममाला-धारायै नमः
50. - देव्यै नमः
51. - पद्मिन्यै नमः
52. - पद्मगन्धिन्यै नमः
53. - पुण्यगन्धायै नमः
54. - सुप्रसन्नायै नमः
55. - प्रसादाभिमुख्यै नमः
56. - प्रभाय नमः
57. - चन्द्रदनायै नमः
58. - चन्द्रायै नमः
59. - चन्द्र-सहोदर्यै नमः
60. - चतुर्भुजायै नमः
61. - चन्द्ररूपायै नमः
62. - इन्दिरायै नमः
63. - इन्दु-शीतलायै नमः
64. - अह्लाद-जनन्यै नमः
65. - पुष्टयै नमः
66. - शिवायै नमः
67. - शिवकर्यै नमः
68. - सत्यै नमः
69. - विमलायै नमः
70. - विश्वजनन्यै नमः
71. - तुष्टयै नमः
72. - दारिद्रयनाशिन्यै नमः
73. - प्रीति-पुष्करिण्यै नमः
74. - शान्तायै नमः
75. - शुक्लमाल्यांबरायै नमः
76. - श्रियै नमः
77. - भास्कर्यै नमः
78. - बिल्व-निलयायै नमः
79. - वरारोहायै नमः
80. - यशस्विन्यै नमः
81. - वसुन्धरायै नमः
82. - उदारांगायै नमः
83. - हरिण्यै नमः
84. - हेममालिन्यै नमः
85. - धनधान्य-कर्यै नमः
86. - सिद्धयै नमः
87. - स्त्रौणसौम्याये नमः
88. - शुभप्रदायै नमः
89. - नृपवेश्मगता नमः
90. - वरलक्ष्म्यै नमः
91. - वसुप्रदायै नमः
92. - शुभार्यै नमः
93. - हिरण्य प्राकारायै नमः
94. - समुद्र-तनयायै नमः
95. - जयायै नमः
96. - मंगलादेव्यै नमः
97. - विष्णुवक्षस्थलस्थितायै नमः
98. - विष्णुपत्न्यै नमः
99. - प्रसन्नाक्ष्यै नमः
100.-नारायण-समा-श्रितायै नमः
101.-दारिद्रî-ध्वंसिन्यै नमः
102.-देव्यौ नमः
103.-सर्वोपद्रव-वारिण्यै नमः
104.-नवदुर्गायै नमः
105.-महाकाव्यै नमः
106.-ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिकायै नमः
107.-त्रिकाल-ज्ञान-संपन्नायै नमः
108.-भुवनेश्वर्यै नमः
"जय जय श्री राधे"

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्

              __श्रीशिव महिम्न: स्तोत्रम्__ शिव महिम्न: स्तोत्रम शिव भक्तों का एक प्रिय मंत्र है| ४३ क्षन्दो के इस स्तोत्र में शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है| स्तोत्र का सृजन एक अनोखे असाधारण परिपेक्ष में किया गया था तथा शिव को प्रसन्न कर के उनसे क्षमा प्राप्ति की गई थी | कथा कुछ इस प्रकार के है … एक समय में चित्ररथ नाम का राजा था| वो परं शिव भक्त था| उसने एक अद्भुत सुंदर बागा का निर्माण करवाया| जिसमे विभिन्न प्रकार के पुष्प लगे थे| प्रत्येक दिन राजा उन पुष्पों से शिव जी की पूजा करते थे | फिर एक दिन … पुष्पदंत नामक के गन्धर्व उस राजा के उद्यान की तरफ से जा रहा था| उद्यान की सुंदरता ने उसे आकृष्ट कर लिया| मोहित पुष्पदंत ने बाग के पुष्पों को चुरा लिया| अगले दिन चित्ररथ को पूजा हेतु पुष्प प्राप्त नहीं हुए | पर ये तो आरम्भ मात्र था … बाग के सौंदर्य से मुग्ध पुष्पदंत प्रत्यक दिन पुष्प की चोरी करने लगा| इस रहश्य को सुलझाने के राजा के प्रत्येक प्रयास विफल रहे| पुष्पदंत अपने दिव्या शक्तियों के कारण अदृश्य बना रहा | और फिर … राजा च...

शिव नाम महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है ‘महादेव महादेव’ कहनेवाले के पीछे पीछे मै नामश्रवण के लोभ से अत्यन्त डरता हुआ जाता हूं। जो शिव शब्द का उच्चारण करके प्राणों का त्याग करता है, वह कोटि जन्मों के पापों से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है । शिव शब्द कल्याणवाची है और ‘कल्याण’ शब्द मुक्तिवाचक है, वह मुक्ति भगवन् शंकर से ही प्राप्त होती है, इसलिए वे शिव कहलाते है । धन तथा बान्धवो के नाश हो जानेके कारण शोकसागर मे मग्न हुआ मनुष्य ‘शिव’ शब्द का उच्चारण करके सब प्रकार के कल्याणको प्राप्त करता है । शि का अर्थ है पापोंका नाश करनेवाला और व कहते है मुक्ति देनेवाला। भगवान् शंकर मे ये दोनों गुण है इसीलिये वे शिव कहलाते है । शिव यह मङ्गलमय नाम जिसकी वाणी मे रहता है, उसके करोड़ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है । शि का अर्थ है मङ्गल और व कहते है दाता को, इसलिये जो मङ्गलदाता है वही शिव है । भगवान् शिव विश्वभर के मनुष्योंका सदा ‘शं’ कल्याण करते है और ‘कल्याण’ मोक्ष को कहते है । इसीसे वे शंकर कहलाते है । ब्रह्मादि देवता तथा वेद का उपदेश करनेवाले जो कोई भी संसार मे महान कहलाते हैं उन सब के देव अर्थात् उपास्य होने...

नाम जप महिमा

श्री रामचरितमानस के अनुसार नामजपकी महिमा... कलियुगमें जितने भी साधनामार्ग है उसमें सबसे सहज मार्ग है भक्तियोग, और भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोग अनुसार साधना करना इस युगकी सर्वश्रेष्ट साधनामार्ग है। संत तुलसीदासने श्री रामचरितमानसमें नामके महिमाका गुणगान किया है।  संत जिस देवी या देवताके स्वरूपकी आराधना कर आध्यात्मिक प्रगति कर आत्मज्ञानी बनते हैं उसी आराध्यके नामकी गुणगान कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। अध्यात्मशास्त्र अनुसार हमारे सूक्ष्म पिंडमें जिस सूक्ष्म तत्त्वकी कमी होती है, जब हम उस तत्त्वकी पूर्ति हेतु उस आराध्यके नामका जप करते हैं तो हमारी आध्यात्मिक प्रगति करते हैं द्रुत गतिसे होती है | जब तक हमने गुरुमंत्र नहीं मिला हो हमें आप कुलदेवता का जप करना चाहिए और यदि कुलदेवताका नाम नहीं पता हो तो या तो ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ का जप करना चाहिए या अपने इष्टदेवताका जप करना चाहिए।  यदि घरमें पितृ दोष हो तो एक घंटे ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करना चाहिए और शेष समय अपने कुलदेवताका या इष्टदेवताका मंत्र जपना चाहिए। ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरके साधक उच्च कोटिक...