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समर्पण से मिलता है भक्ति का फल


एक गांव में एक पंडित और एक लकड़हारा रहता था। गांव से कुछ दूर पर शिव मंदिर था। दोनों ही शिवजी के परम भक्त थे और अपने अपने तरीके से शिवजी की पूजा करते थे।

हर सुबह पंडित मंदिर जाते शिवजी को जल चढ़ाते और देर तक भजन कीर्तन करते रहते थे। उसके बाद लकड़हारा मंदिर जाता और शिवजी के हाथ जोड़कर वापस आ जाता। यह क्रम रोजाना चलता।

मंदिर और गांव के बीच में एक नदी भी पड़ती थी। एक दिन जब पंडित जी पूजा करने के लिए मंदिर जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि नदी में बाढ़ आ गई है पंडित ने बह जाने के डर से नदी के एक तरफ से हाथ जोड़कर वापस चले आए।

पीछे पीछे लकड़हारा भी पहुंच गया, जब उसने देखा कि नदी में बाढ़ आ गई है तो थोड़ी देर सोचने लगा और फिर नदी में छलांग लगा दी। मंदिर में पहुंच कर रोजाना की तरह शिवजी के हाथ जोड़े और लौटने लगा जैसे ही लकड़हारा पलटा तभी शिवजी प्रकट हुए और लकड़हारे से कहा कि भक्त में तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं तुम वरदान मांगो।

तभी पंडित ने आवाज लगाकर कहा कि प्रभु ये क्या कर रहे हैं। आपके वरदान पर तो मेरा हक है क्योंकि आपकी पूजा तो में ही करता था। ये तो रोज आपके केवल हाथ जोड़ता था। तब शिवजी बोले आज जब नदी में बाढ़ आई तो तुमने अपने प्राणों के मोह के कारण मेरी पूजा नहीं की लेकिन इस लकड़हारे ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए अपने नियम का पालन किया और इसके समर्पण भाव से ही प्रसन्न होकर मैं इसे वरदान देना चाहता हूं।

कहानी का भाव यही है कि अगर आप घंटों बैठकर भी ध्यान मग्र रहें लेकिन आपका मन कहीं और हो तो आपको प्रभु कृपा नहीं मिल सकती। आपकी भक्ति में दिखावा नहीं बल्कि समर्पण भाव होना चाहिए तभी ईश्वर आप पर प्रसन्न होते हैं

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