एक समय श्री रंगनाथ मंदिर के महंत जो की प्रभु के बहुत प्रिय भक्त भी थे, अपने कुछ शिष्यों को साथ लेकर दक्षिण में तीर्थ दर्शन करते हुए एक नगर में पहुंचे।
संध्या का समय था, मार्ग में बहुत ही रमणीय उपवन देख महंत जी का मन हुआ यही कुछ देर विश्राम कर, भोजन प्रसाद बनाकर हरिनाम संकीर्तन किया जाये।
संयोग से वह स्थान एक वेश्या का था, वेश्या वही पास के भवन में रहती थी।
महंत जी और उनके शिष्यों को इस बात का पता नहीं था की जिस जगह वह रुके हैं, विश्राम व भोजन प्रसादी कर रहे हैं वो स्थान एक वेश्या का है।
वेश्या भी दूर से अपने भवन से हरि भक्तो की क्रियाओं का आनंद ले रही थी।
द्वार पर बहुत सुन्दर-सुन्दर श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, अपने साथ अपने ठाकुर जी को भी लाये, आज मानो संतो के प्रभाव मात्र से पापआसक्त उस वेश्या के ह्रदय में भी प्रभु का प्रेम प्रस्फुटित हो रहा हो।
स्वयं को बड़भागी जान उसने संतो को विघ्न न हो ये जानकर तथा अपने बारे में कुछ न बताकर दूर से ही अपने भवन से ठाकुर जी के दर्शनों का आनंद लेती रही।
जब सभी संतो का भोजन प्रसाद व संकीर्तन समाप्त हुआ तो अंत में वह वेश्या ने एक थाल में बहुत सारी स्वर्ण मुद्राएँ लेकर महंत जी के समक्ष प्रस्तुत हुई और महंत जी को प्रणाम किया व बताया की ये स्थान मेरा ही है, मैं यहाँ की मालकिन हुँ।
महंत जी को बड़ी प्रसन्नता हुई ये जानकर और आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने भी कहा की यह बहुत ही रमणीय स्थान है, हमारे ठाकुर जी को भी बड़ा पसंद आया है यह स्थान, संकीर्तन में भी बड़ा मन लगा।
अब वेश्या ने वो स्वर्ण से भरा हुआ थाल महंतजी की सेवा में प्रस्तुत किया।
सचे संतो का स्वाभाव होता है वो बिना जाने किसी भी अयोग्य व्यक्ति का धन या सेवा नहीं लेते हैं, और शास्त्र भी अनुमति नहीं देता है।
अतः महंत जी ने उस वेश्या से कहा हम बिना जाने ये धन स्वीकार नहीं कर सकते, आपने किस तरह से यह धन अर्जित किया है?
वेश्या ने भी द्वार पर आये संतो से झूठ न कहकर सारी बात सच-सच बता दी की, मैं एक वेश्या हूँ, समाज के आसक्त पुरुषों को रिझाती हूँ , उसी से मैंने यह धन अर्जित किया है।
इतना कहकर वह महंत जी के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हुए फुट-फुट कर रोने लगी, व महंतजी से श्री ठाकुरजी की भक्ति का दान देने का अनुग्रह करने लगी।
महंत जी को भी दया आयी उसके इस अनुग्रह पर, लेकिन वे बड़े धर्म संकट में पड़ गये, यदि वेश्या का धन स्वीकार किया तो धर्म की हानि होगी और यदि शरण में आये हुए को स्वीकारा नहीं, मार्ग नहीं दिखाया तो भी संत धर्म की हानि।
अब महंत जी ने अपने रंगनाथ जी का ध्यान किया और उन्ही को साक्षी कर वेश्या के सामने शर्त रखी और कहा हम तो ये धन स्वीकार नहीं कर सकते यदि तुम ह्रदय से अपने इस बुरे कर्म को छोड़ना ही चाहती हो तो ऐसा करो इस पाप कर्म से अर्जित की हुई सारी संपत्ति को तुरंत बेचकर जो धन आये उससे हमारे रंगनाथ जी के लिए सुन्दर सा मुकुट बनवाओ।
यदि हमारे प्रभु वह मुकुट स्वीकार कर ले तो समझ लेना उन्होंने तुम्हे माफ़ करके अपनी कृपा प्रदान की है।
वेश्या का मन तो पहले ही निर्मल हो चूका था, महंत जी की आज्ञा शिरोधार्य कर तुरंत ही सम्पूर्ण संपत्ति बेचकर उसने रंगनाथ जी के लिये ३ लाख रुपये का सुन्दर मुकुट बनवाया।
कुछ ही दिनों में वेश्या ने मुकुट बनवाकर अपने नगर से महंत जी के साथ रंगनाथ जी मंदिर के लिये प्रस्थान किया।
मंदिर पहुंचते ही जब यह बात समस्त ग्रामवासीयों और मंदिर के पुजारियों को पता चली की अब वेश्या के धन से अर्जित मुकुट रंगनाथजी धारण करेंगे तो सभी अपना-अपना रोष व्यक्त करने लगे, और महंत जी और उस वेश्या का मजाक उड़ाने लगे।
महंत जी सिद्ध पुरुष थे और रंगनाथजी के सर्वविदित प्रेमी भक्त भी थे तो किसी ने उनका विरोध करने की चेष्ठा नहीं की।
अब देखिये जैसे ही वो वेश्या मंदिर में प्रवेश करने लगी, द्वार तक पहुंची ही थी की पूर्व का पाप बीच में आ गया, वेश्या वहीं 'रजस्वला' हो गई
माथा पीट लिया अपना, फुट फुटकर रोने लगी, मूर्छित होके भूमि पे गिर पड़ी।
हाय महा-दुःख, संत की कृपा हुई, रंगनाथ जी का अनुग्रह प्राप्त होने ही वाला था की रजस्वला हो गई , मंदिर में जाने लायक ही न रही।
सब लोग हसीं उड़ाने लगे, पुजारी भी महंत जी को कोसने लगे।
अब महंत जी भी क्या करते, उन्होंने वेश्या के हाथ से मुकुट लेकर स्वयं रंगनाथ जी के गर्भगृह प्रवेश कर श्री रंगनाथ जी को मुकुट पहनाने लगे।
इधर महंत जी बार-बार मुकुट प्रभु के मस्तक पर धराए और रंग जी धारण ही न करें। मुकूट बार बार रंगनाथ जी के सिर से निचे गिर जाय।।
रंगनाथ जी बोले मुकूट तो उसी वैस्या के हाथ से ही पहनेंगे, इतने प्यार व भाव से बनवाकर लाई है।
अपने हाथों से वैस्या मुकूट धारण कराने लगी और चक्षुओं से अविरल अश्रुधारा बहने लगी मानो रंगनाथ जी का अभिषेक हो रहा हो।।
ऐसा है हमारे प्रभु का प्रेम।।
संध्या का समय था, मार्ग में बहुत ही रमणीय उपवन देख महंत जी का मन हुआ यही कुछ देर विश्राम कर, भोजन प्रसाद बनाकर हरिनाम संकीर्तन किया जाये।
संयोग से वह स्थान एक वेश्या का था, वेश्या वही पास के भवन में रहती थी।
महंत जी और उनके शिष्यों को इस बात का पता नहीं था की जिस जगह वह रुके हैं, विश्राम व भोजन प्रसादी कर रहे हैं वो स्थान एक वेश्या का है।
वेश्या भी दूर से अपने भवन से हरि भक्तो की क्रियाओं का आनंद ले रही थी।
द्वार पर बहुत सुन्दर-सुन्दर श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, अपने साथ अपने ठाकुर जी को भी लाये, आज मानो संतो के प्रभाव मात्र से पापआसक्त उस वेश्या के ह्रदय में भी प्रभु का प्रेम प्रस्फुटित हो रहा हो।
स्वयं को बड़भागी जान उसने संतो को विघ्न न हो ये जानकर तथा अपने बारे में कुछ न बताकर दूर से ही अपने भवन से ठाकुर जी के दर्शनों का आनंद लेती रही।
जब सभी संतो का भोजन प्रसाद व संकीर्तन समाप्त हुआ तो अंत में वह वेश्या ने एक थाल में बहुत सारी स्वर्ण मुद्राएँ लेकर महंत जी के समक्ष प्रस्तुत हुई और महंत जी को प्रणाम किया व बताया की ये स्थान मेरा ही है, मैं यहाँ की मालकिन हुँ।
महंत जी को बड़ी प्रसन्नता हुई ये जानकर और आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने भी कहा की यह बहुत ही रमणीय स्थान है, हमारे ठाकुर जी को भी बड़ा पसंद आया है यह स्थान, संकीर्तन में भी बड़ा मन लगा।
अब वेश्या ने वो स्वर्ण से भरा हुआ थाल महंतजी की सेवा में प्रस्तुत किया।
सचे संतो का स्वाभाव होता है वो बिना जाने किसी भी अयोग्य व्यक्ति का धन या सेवा नहीं लेते हैं, और शास्त्र भी अनुमति नहीं देता है।
अतः महंत जी ने उस वेश्या से कहा हम बिना जाने ये धन स्वीकार नहीं कर सकते, आपने किस तरह से यह धन अर्जित किया है?
वेश्या ने भी द्वार पर आये संतो से झूठ न कहकर सारी बात सच-सच बता दी की, मैं एक वेश्या हूँ, समाज के आसक्त पुरुषों को रिझाती हूँ , उसी से मैंने यह धन अर्जित किया है।
इतना कहकर वह महंत जी के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हुए फुट-फुट कर रोने लगी, व महंतजी से श्री ठाकुरजी की भक्ति का दान देने का अनुग्रह करने लगी।
महंत जी को भी दया आयी उसके इस अनुग्रह पर, लेकिन वे बड़े धर्म संकट में पड़ गये, यदि वेश्या का धन स्वीकार किया तो धर्म की हानि होगी और यदि शरण में आये हुए को स्वीकारा नहीं, मार्ग नहीं दिखाया तो भी संत धर्म की हानि।
अब महंत जी ने अपने रंगनाथ जी का ध्यान किया और उन्ही को साक्षी कर वेश्या के सामने शर्त रखी और कहा हम तो ये धन स्वीकार नहीं कर सकते यदि तुम ह्रदय से अपने इस बुरे कर्म को छोड़ना ही चाहती हो तो ऐसा करो इस पाप कर्म से अर्जित की हुई सारी संपत्ति को तुरंत बेचकर जो धन आये उससे हमारे रंगनाथ जी के लिए सुन्दर सा मुकुट बनवाओ।
यदि हमारे प्रभु वह मुकुट स्वीकार कर ले तो समझ लेना उन्होंने तुम्हे माफ़ करके अपनी कृपा प्रदान की है।
वेश्या का मन तो पहले ही निर्मल हो चूका था, महंत जी की आज्ञा शिरोधार्य कर तुरंत ही सम्पूर्ण संपत्ति बेचकर उसने रंगनाथ जी के लिये ३ लाख रुपये का सुन्दर मुकुट बनवाया।
कुछ ही दिनों में वेश्या ने मुकुट बनवाकर अपने नगर से महंत जी के साथ रंगनाथ जी मंदिर के लिये प्रस्थान किया।
मंदिर पहुंचते ही जब यह बात समस्त ग्रामवासीयों और मंदिर के पुजारियों को पता चली की अब वेश्या के धन से अर्जित मुकुट रंगनाथजी धारण करेंगे तो सभी अपना-अपना रोष व्यक्त करने लगे, और महंत जी और उस वेश्या का मजाक उड़ाने लगे।
महंत जी सिद्ध पुरुष थे और रंगनाथजी के सर्वविदित प्रेमी भक्त भी थे तो किसी ने उनका विरोध करने की चेष्ठा नहीं की।
अब देखिये जैसे ही वो वेश्या मंदिर में प्रवेश करने लगी, द्वार तक पहुंची ही थी की पूर्व का पाप बीच में आ गया, वेश्या वहीं 'रजस्वला' हो गई
माथा पीट लिया अपना, फुट फुटकर रोने लगी, मूर्छित होके भूमि पे गिर पड़ी।
हाय महा-दुःख, संत की कृपा हुई, रंगनाथ जी का अनुग्रह प्राप्त होने ही वाला था की रजस्वला हो गई , मंदिर में जाने लायक ही न रही।
सब लोग हसीं उड़ाने लगे, पुजारी भी महंत जी को कोसने लगे।
अब महंत जी भी क्या करते, उन्होंने वेश्या के हाथ से मुकुट लेकर स्वयं रंगनाथ जी के गर्भगृह प्रवेश कर श्री रंगनाथ जी को मुकुट पहनाने लगे।
इधर महंत जी बार-बार मुकुट प्रभु के मस्तक पर धराए और रंग जी धारण ही न करें। मुकूट बार बार रंगनाथ जी के सिर से निचे गिर जाय।।
रंगनाथ जी बोले मुकूट तो उसी वैस्या के हाथ से ही पहनेंगे, इतने प्यार व भाव से बनवाकर लाई है।
अपने हाथों से वैस्या मुकूट धारण कराने लगी और चक्षुओं से अविरल अश्रुधारा बहने लगी मानो रंगनाथ जी का अभिषेक हो रहा हो।।
ऐसा है हमारे प्रभु का प्रेम।।
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