जगन्माता पार्वती के जन्म का प्रसंग
पूर्वकाल में प्रजापति दक्ष की पुत्री स्वधा को तीन पुत्रियाँ हुयीं-मेनका, धन्या और कलावती। ये तीनो परम् साध्वी और धार्मिक थीं। धन्या का विवाह विदेहराज जनकजी से हुआ, जिसकी पुत्री श्रीराम की प्राणप्रिया “सीता” थीं, कलावती का विवाह द्वापर में वृषभानु वैश्य से हुआ जिनकी पुत्री श्री कृष्णप्रिया “राधा” हुईं और सबसे बड़ी मेना का विवाह श्रीविष्णुके अंश और बिभिन्न सम्पदाओं एवं औषधियों से परिपूर्ण गिरिराज हिमालय से हुआ। मेना ने कठिन तपस्याकर साक्षात् भगवती को पुत्री, जो पूर्व जन्म में सती थीं, के रूप में पाने का सौभाग्य प्राप्त किया। वसन्त ऋतुके चैत मास के नवमी तिथि को मृगशिरा नक्षत्र में इनका प्रादुर्भाव हुआ था।
पार्वती की तपस्या
एकबार घूमते – घूमते नारदजी हिमपतिके यहाँ पधारे। यथोचित सम्मान पा माता पिता के अनुरोध पर उन्होंने पार्वती की हस्तरेखाओं को देखकर बतायाकि कन्या तो समस्त शुभलक्षणों से सम्पन्न है की किन्तु इसका विवाह बिना माता-पिता के एक योगी, जो नंग-धड़ंग, मान-सम्मान रहित और सतत् अमङ्गल वेशधारी रहेगा, के साथ होगा। यह सुन दोनोंने अत्यन्त विचलित होकर नारदजी से इस कुलक्षण की शान्ति के सम्बन्ध में पूछा। नारदजी ने कहाकि यद्यपिकि विधाता का लिखा होकर रहेगा, किन्तु यदि इस कन्या का विवाह भगवान शिवशंकर, जो परम् मंगलकारी तो हैं, किन्तु उनमें भी उपरोक्त सारे गुण पाये जाते हैं। इससे यह कुलक्षण शुभ हो जायेगा। परन्तु इस हेतु पार्वतीको लगन से तपस्या करनी होगी।”
इस भविष्यवाणी को जान माता-पिता की आज्ञा ले अत्यंत प्रशन्नता पूर्वक पर्वती गंगावतरण नामक शिखर पर अवस्थित श्रृंगीतीर्थ तीर्थ में कठिन तपस्या करने लगीं। चूँकि, पार्वती ने वहाँ तपस्या की थी, अतः उस स्थान का नाम ही “गौरी-शिखर” पड़ गया।
शिवजी द्वारा कामदेव को भस्म करना
उन्हीं दिनों तारकासुर नामक एक दैत्य हुआ था, जो श्रीब्रम्हाजी से बरदान पाकर भयंकर अत्याचारी हो गया था। तीनों लोकों को जीतकर उसने अपने आपको इन्द्रपद पर आसीन कर लिया।
उस राक्षस से कष्टप्राप्त देवों को ब्रम्हदेव ने यह रहस्य बतायाकि उसको उनका (ब्रम्हाजी का) यह बरदान प्राप्त है कि शिवजी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र के द्वारा ही वह मारा जायेगा, अतः भोलेनाथ को विवाह करने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए। देवताओं को यह पता था कि सती मृत्यु के पश्चात शिवजी वैरागी हो कठिन तपस्या में लीन हैं, जिससे उन्हें विमुख करना आसान नहीं है, अतः उन्होंने कामदेव को इस कार्य पर नियुक्त किया। वहाँ जाकर काम ने बहुत प्रयास किये और जब सफल नहीं हुआ तो अपना अन्तिम अस्त्र ” पंचबाण” को ही शिवजी पर चला दिया। इसके फलस्वरूप भोलेनाथ विचलित हो गए ,किन्तु उन्होंने जब पाया की यह कामदेव की करतूत है तो अत्यन्त क्रोधित हो उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि की ज्वाला में उसे भस्म कर डाला । यह देख देवताओं में हाहाकार मच गया। काम की पत्नी को जब अपने पति की इस दुर्दशा की जानकारी हुई तो विलाप करते हुए वह शिवजी के चरणों पर गिर गयी। आशुतोष द्रवित हो गए और कहा,”अभी तो कामदेव अनंग (बिना शरीर का) रहकर ही अपना कार्य करेगा किन्तु द्वापर में श्रीकृष्ण का पुत्र “प्रद्युम्न” बनकर वह रति से विवाह सूत्र में फिर से बंध जायेगा।”
शिवजी का विवाह हेतु स्वीकृति देना
तत्पश्चात्, श्रीविष्णु समेत सभी देवगण ने शिवजी के पास आकर उनकी वन्दना की और सती का हिमपुत्री पार्वती के रूप में जन्म ले उनसे विवाह करने की पावन कामना लिए कठिन तपस्या में लीन होने के संबंध में बताया। फिर उन्होने तारकासुर के उत्पात के बारे में बताकर शिवजी से महातपिस्विनी पार्वतीजी से विवाह करने का अनुरोध किया। पहले तो शिवशंकर ने मनाकर दिया किन्तु समस्त देवगणों के हार्दिक अनुरोध को टाल न सके और अपनी स्वीकृति दे दी।
कुछ दिनों बाद शंकरजी ने परीक्षा लेने हेतु सप्तऋषियों को भेजा, और उनसे उनकी अडिग प्रतिज्ञा सुन स्वयं ही इस हेतु चले गए। उन्हों ने बहुत प्रकार से पार्वतीजी के मन को विचलित करने का प्रयास किया किन्तु उनकी सच्ची प्रतिज्ञा के आगे वे भी झुक गए और अति प्रशन्न हो गए। फिर शिवजी के अनुरोध पर पार्वती भी पिता के घर आ गयीं।
इसके बाद भी भोलेबाबा ने लीला करना नहीं छोड़ा। एकबार वे नटराज का वेश धारण कर हिमवान के घर आकर पार्वती का हाथ माँगा किन्तु वहाँ से विदाकर दिये गए। फिर दूसरीबार ज्योतिषी बन हिमालय को समझाने लगेकि शिवजी से अपनी पुत्री का विवाह न करें, किन्तु फिर असफल रहे।
शिव-पार्वती विवाह
तदुपरान्त देवताओं ने श्रीशंकर की सहमति ले सप्तऋषियों द्वारा विवाह की तैयारी करने का सन्देश भिजवाया। उनके अनुरोध पर हिमपति ने एक शुभ दिन दिखवाकर शिवजी को विवाह का निमन्त्रण-पत्र भेज दिया।
फिर तो दोनों और इस पावन उत्सव की तैयारी होने लगी। निश्चित दिन आनेपर अपने गणों द्वारा वररूप में संवारे गये भोलेनाथ अदभुद और विचित्र बारात ले हिमपुरी को चल दिए। बूढ़े बसहा पर सवार शिव बरात में समस्त देवों, ऋषियों और सिद्धों के साथ-साथ भूत, प्रेत, वैताल आदि सब सम्मलित थे।
हिमवानने बरातियों का अपूर्व स्वागत- सत्कार किया। किन्तु परिछन के समय मेना ने जटाजूटधारी, भस्म लपेटे, भयंकर विषधर सर्पों का अंग-प्रत्यंगों में आभूषण पहने हुए और गंगाजी को माथे पर लिए हुये वर को देखा तो भय से अचेत हो गयीं। फिर नटवर ने अपनी लीला समेटी और अति मनोहर स्वरुप में प्रगट हो गये। इसे देखकर माता मेनका समेत सभी सखियाँ और पुरवासी आनन्दित होकर जयजयकार करने लगे और विवाह की विधियों को सपन्न करवाने में लग गए। तत्पश्चात् अति शुभ लग्न में शिव- पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। फिर दोनों दम्पति कैलाश आकर सुखपूर्वक अपनी लीला करने लगे।
पूर्वकाल में प्रजापति दक्ष की पुत्री स्वधा को तीन पुत्रियाँ हुयीं-मेनका, धन्या और कलावती। ये तीनो परम् साध्वी और धार्मिक थीं। धन्या का विवाह विदेहराज जनकजी से हुआ, जिसकी पुत्री श्रीराम की प्राणप्रिया “सीता” थीं, कलावती का विवाह द्वापर में वृषभानु वैश्य से हुआ जिनकी पुत्री श्री कृष्णप्रिया “राधा” हुईं और सबसे बड़ी मेना का विवाह श्रीविष्णुके अंश और बिभिन्न सम्पदाओं एवं औषधियों से परिपूर्ण गिरिराज हिमालय से हुआ। मेना ने कठिन तपस्याकर साक्षात् भगवती को पुत्री, जो पूर्व जन्म में सती थीं, के रूप में पाने का सौभाग्य प्राप्त किया। वसन्त ऋतुके चैत मास के नवमी तिथि को मृगशिरा नक्षत्र में इनका प्रादुर्भाव हुआ था।
पार्वती की तपस्या
एकबार घूमते – घूमते नारदजी हिमपतिके यहाँ पधारे। यथोचित सम्मान पा माता पिता के अनुरोध पर उन्होंने पार्वती की हस्तरेखाओं को देखकर बतायाकि कन्या तो समस्त शुभलक्षणों से सम्पन्न है की किन्तु इसका विवाह बिना माता-पिता के एक योगी, जो नंग-धड़ंग, मान-सम्मान रहित और सतत् अमङ्गल वेशधारी रहेगा, के साथ होगा। यह सुन दोनोंने अत्यन्त विचलित होकर नारदजी से इस कुलक्षण की शान्ति के सम्बन्ध में पूछा। नारदजी ने कहाकि यद्यपिकि विधाता का लिखा होकर रहेगा, किन्तु यदि इस कन्या का विवाह भगवान शिवशंकर, जो परम् मंगलकारी तो हैं, किन्तु उनमें भी उपरोक्त सारे गुण पाये जाते हैं। इससे यह कुलक्षण शुभ हो जायेगा। परन्तु इस हेतु पार्वतीको लगन से तपस्या करनी होगी।”
इस भविष्यवाणी को जान माता-पिता की आज्ञा ले अत्यंत प्रशन्नता पूर्वक पर्वती गंगावतरण नामक शिखर पर अवस्थित श्रृंगीतीर्थ तीर्थ में कठिन तपस्या करने लगीं। चूँकि, पार्वती ने वहाँ तपस्या की थी, अतः उस स्थान का नाम ही “गौरी-शिखर” पड़ गया।
शिवजी द्वारा कामदेव को भस्म करना
उन्हीं दिनों तारकासुर नामक एक दैत्य हुआ था, जो श्रीब्रम्हाजी से बरदान पाकर भयंकर अत्याचारी हो गया था। तीनों लोकों को जीतकर उसने अपने आपको इन्द्रपद पर आसीन कर लिया।
उस राक्षस से कष्टप्राप्त देवों को ब्रम्हदेव ने यह रहस्य बतायाकि उसको उनका (ब्रम्हाजी का) यह बरदान प्राप्त है कि शिवजी के वीर्य से उत्पन्न पुत्र के द्वारा ही वह मारा जायेगा, अतः भोलेनाथ को विवाह करने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए। देवताओं को यह पता था कि सती मृत्यु के पश्चात शिवजी वैरागी हो कठिन तपस्या में लीन हैं, जिससे उन्हें विमुख करना आसान नहीं है, अतः उन्होंने कामदेव को इस कार्य पर नियुक्त किया। वहाँ जाकर काम ने बहुत प्रयास किये और जब सफल नहीं हुआ तो अपना अन्तिम अस्त्र ” पंचबाण” को ही शिवजी पर चला दिया। इसके फलस्वरूप भोलेनाथ विचलित हो गए ,किन्तु उन्होंने जब पाया की यह कामदेव की करतूत है तो अत्यन्त क्रोधित हो उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि की ज्वाला में उसे भस्म कर डाला । यह देख देवताओं में हाहाकार मच गया। काम की पत्नी को जब अपने पति की इस दुर्दशा की जानकारी हुई तो विलाप करते हुए वह शिवजी के चरणों पर गिर गयी। आशुतोष द्रवित हो गए और कहा,”अभी तो कामदेव अनंग (बिना शरीर का) रहकर ही अपना कार्य करेगा किन्तु द्वापर में श्रीकृष्ण का पुत्र “प्रद्युम्न” बनकर वह रति से विवाह सूत्र में फिर से बंध जायेगा।”
शिवजी का विवाह हेतु स्वीकृति देना
तत्पश्चात्, श्रीविष्णु समेत सभी देवगण ने शिवजी के पास आकर उनकी वन्दना की और सती का हिमपुत्री पार्वती के रूप में जन्म ले उनसे विवाह करने की पावन कामना लिए कठिन तपस्या में लीन होने के संबंध में बताया। फिर उन्होने तारकासुर के उत्पात के बारे में बताकर शिवजी से महातपिस्विनी पार्वतीजी से विवाह करने का अनुरोध किया। पहले तो शिवशंकर ने मनाकर दिया किन्तु समस्त देवगणों के हार्दिक अनुरोध को टाल न सके और अपनी स्वीकृति दे दी।
कुछ दिनों बाद शंकरजी ने परीक्षा लेने हेतु सप्तऋषियों को भेजा, और उनसे उनकी अडिग प्रतिज्ञा सुन स्वयं ही इस हेतु चले गए। उन्हों ने बहुत प्रकार से पार्वतीजी के मन को विचलित करने का प्रयास किया किन्तु उनकी सच्ची प्रतिज्ञा के आगे वे भी झुक गए और अति प्रशन्न हो गए। फिर शिवजी के अनुरोध पर पार्वती भी पिता के घर आ गयीं।
इसके बाद भी भोलेबाबा ने लीला करना नहीं छोड़ा। एकबार वे नटराज का वेश धारण कर हिमवान के घर आकर पार्वती का हाथ माँगा किन्तु वहाँ से विदाकर दिये गए। फिर दूसरीबार ज्योतिषी बन हिमालय को समझाने लगेकि शिवजी से अपनी पुत्री का विवाह न करें, किन्तु फिर असफल रहे।
शिव-पार्वती विवाह
तदुपरान्त देवताओं ने श्रीशंकर की सहमति ले सप्तऋषियों द्वारा विवाह की तैयारी करने का सन्देश भिजवाया। उनके अनुरोध पर हिमपति ने एक शुभ दिन दिखवाकर शिवजी को विवाह का निमन्त्रण-पत्र भेज दिया।
फिर तो दोनों और इस पावन उत्सव की तैयारी होने लगी। निश्चित दिन आनेपर अपने गणों द्वारा वररूप में संवारे गये भोलेनाथ अदभुद और विचित्र बारात ले हिमपुरी को चल दिए। बूढ़े बसहा पर सवार शिव बरात में समस्त देवों, ऋषियों और सिद्धों के साथ-साथ भूत, प्रेत, वैताल आदि सब सम्मलित थे।
हिमवानने बरातियों का अपूर्व स्वागत- सत्कार किया। किन्तु परिछन के समय मेना ने जटाजूटधारी, भस्म लपेटे, भयंकर विषधर सर्पों का अंग-प्रत्यंगों में आभूषण पहने हुए और गंगाजी को माथे पर लिए हुये वर को देखा तो भय से अचेत हो गयीं। फिर नटवर ने अपनी लीला समेटी और अति मनोहर स्वरुप में प्रगट हो गये। इसे देखकर माता मेनका समेत सभी सखियाँ और पुरवासी आनन्दित होकर जयजयकार करने लगे और विवाह की विधियों को सपन्न करवाने में लग गए। तत्पश्चात् अति शुभ लग्न में शिव- पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। फिर दोनों दम्पति कैलाश आकर सुखपूर्वक अपनी लीला करने लगे।
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