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विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (काशी)


भूत-भावन भगवान शिवके द्वादश ज्योतिर्लिंगोंमें सातवां ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग है । काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेशके काशी(वाराणसी-बनारस) नगरमें गंगा तटके दशाश्मेघ घाटके निकट स्थित है । भगवान भोलेनाथके त्रिशूलपर विराजती यह अविचल काशी त्रैलोक्यमें न्यारी है । निराकार महेश्वर ही यहां श्री विश्वनाथके रूपमें विद्यमान हैं ।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंगकी कथा :
स्कन्द पुराणके अनुसार काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्यकी पूजा, तपस्या आदिसे प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथके रूपमें साक्षात् प्रकट हुए । पुराणोंके अनुसार ब्रहमाजीने प्रथम निर्गुणसे सगुण रूप धारण करके पुन: शिवशक्ति रूपमें पुरूष एवं स्त्री भेदके दो रूप धारण किए ।
इस प्रकृति-पुरूष (शिव-शक्ति) को भगवान शिवने उत्तम सृष्टिकी रचना करनेके लिए आकाशवाणीद्वारा तप करनेका आदेश दिया । तप करनेके लिए उत्तम स्थानकी प्रार्थनापर निर्गुण शिवने अपनी ही प्रेरणासे समस्त तेज सम्पन्न अत्यन्त शोभायमान पंचकोशी नगरीका निर्माण किया, वहांपर उपस्थित हो विष्णुजीने दीर्घकाल तक शिवजीका ध्यान करते हुए तप किया । तब उनकी तपस्याके फलस्वरूप अनेक शिलाखण्डोंसे जलधाराएं निकलकर प्रकट हो   गईं ।

इस अदभुत दृश्यको देखकर विस्मित हुए भगवान विष्णुने ज्यों ही मस्तक हिलाया, तभी उनके कानसे एक मणि वहां गिर पडी जिससे उस स्थानका नाम ही मणिकार्णिका तीर्थ पड गया । मणिकार्णिकाके उस पांचकोसी विस्तारवाले सम्पूर्ण जलको शिवजीने अपने त्रिशूलपर धारण   किया । जिसमें विष्णुजी अपनी पत्नी माता लक्ष्मी सहित विश्राम करने लगे और शिवजीकी आज्ञासे उनके नाभि कमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई । ब्रह्माजीने शिवजीकी आज्ञासे इस अद्धुत सृष्टिकी रचना की । जिसमें पचास कोटि योजनमें विस्तृत चौदह लोक बसे हैं ।
शिवजीने अपने ही कर्मोमें(लीलाओंमें) पंचकोशी नगरीको सम्पूर्ण लोकोंसे पृथक रखा । इसी नगरीमें शिवजीने अपने मुक्तिदायक ज्योतिर्लिंगको स्वंय स्थापित किया । शिवजीने पुन: उसी काशीको अपने त्रिशूलसे उतारकर मृत्यु लोकमें स्थापित कर दिया । काशीमें अविमुक्तेशवर लिंग सदा स्थिर रहता है । कहीं भी गति न पानेवाले प्राणियोंकी वाराणसीपुरीमें गति हो जाती है । महापुण्यदायक पंचकोशी नगरीमें देवता भी मृत्युकी कामना करते हैं । साकार रूपमें आंतरिक रूपसे सत्त्वगुणी और बाह्य रूपसे तमोगुणी (निर्गुण रूपमें त्रिगुणातीत) रूद्रकी प्रार्थनापर पार्वती सहित विश्वनाथ भगवान शिवने इस नगरीको अपना स्थाई निवास बनाया है । यह ज्योतिर्लिंग श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंगके नामसे भी विख्यात है ।
काशीके संबंधमें सनातन धर्मावलम्बियोंका विश्वास है कि प्रलयकालमें भी इसका लोप नहीं होता । उस समय भगवान  शिव इस नगरीको अपने  त्रिशूलपर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आनेपर पुनः इसे तथा स्थानपर रख देते हैं । यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यही भूमि कही जाती है । अगस्त्य मुनिने भी विश्वेश्वरकी बडी आराधनाकी थी और इन्हींकी अर्चनासे श्री वसिष्ठजी तीनों लोकोंमें पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्रको ब्रह्मर्षि कहलानेका गौरव प्राप्त हुआ

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