अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी थी। इंद्र द्वारा छल पूर्वक किए गए शीलहरण की सज़ा अहिल्या को भी भुगतनी पड़ी। ऋषि ने उसे शिला बन जाने का शाप दे दिया। इससे मुक्ति का उपाय राम का चरण स्पर्श था। त्रेता युग में अवतार लेकर जब राम ऋषि विश्वामित्र के साथ जनकपुरी पहुँचे तो वहाँ उन्होंने गौतम ऋषि का आश्रम भी देखा। वहीं राम के चरण स्पर्श से अहिल्या शाप मुक्त होकर पुनः मानवी बन गई।
राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा। राम बोले, "भगवन्! यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहाँ कोई ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?"
विश्वामित्र जी ने बताया, यह स्थान कभी महर्षि गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी के साथ यहाँ रह कर तपस्या करते थे। एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम ऋषि के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की। यद्यपि अहिल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह विचार करके कि मैं इतनी सुन्दर हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी। जब इन्द्र अपने लोक लौट रहे थे तभी अपने आश्रम को वापस आते हुये गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण किये हुये था। वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया कि रे दुराचारिणी! तू हजारों वर्षों तक केवल हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहाँ राख में पड़ी रहे। जब राम इस वन में प्रवेश करेंगे तभी उनकी कृपा से तेरा उद्धार होगा। तभी तू अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकेगी। यह कह कर गौतम ऋषि इस आश्रम को छोड़कर हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगे।
इसलिये विश्वामित्र जी ने कहा "हे राम ! अब तुम आश्रम के अन्दर जाकर अहिल्या का उद्धार करो।" विश्वामित्र जी की बात सुनकर वे दोनों भाई आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुये। वहाँ तपस्या में निरत अहिल्या कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, केवल उसका तेज सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो रहा था। जब अहिल्या की दृष्टि राम पर पड़ी तो उनके पवित्र दर्शन पाकर एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में दिखाई देने लगी। नारी रूप में अहिल्या को सम्मुख पाकर राम और लक्ष्मण ने श्रद्धापूर्वक उनके चरण स्पर्श किये। उससे उचित आदर सत्कार ग्रहण कर वे मुनिराज के साथ पुनः मिथिला पुरी को लौट आये।
रामायण की एक पात्र, प्रातः स्मरणीय पंचकन्या में से एक जो राम के चरण स्पर्श से अहिल्या शाप मुक्त होकर पुनः मानवी बन गई।
शिक्षा ,,,,,,,,
१. पर पुरुष के साथ भोगपूर्ण दृष्टि एवं कुकर्म ऋषियों , मनीषियों एवं संतो के मत से दोषपूर्ण है क्योंकि इससे जहाँ ब्रह्मचर्य नष्ट होता है वहां शरीर में ओज एवं मेधा के निर्माण में रूकावट या विलम्ब एवं अपनों के प्रति प्रेम में विश्वास एवं व्यवहारिकता नष्ट होती है;;;;; ऐसा मन पत्थर सामान है !;;;;;;;; अतः यहाँ "शिला " संवेदन हीनता एवं नष्ट मर्यादाओं का प्रतीक स्वरुप लगती है ! यह संवेदनहीनता मन की सुंदरता एवं मानवीय मर्यादाओं को समाप्त कर देती है ! भगवान् राम मर्यादा स्वरुप एवं सुन्दर चरित्र के स्वरुप थे अतः वही " उद्धार" करने के अधिकारी बने !
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