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भोलेनाथ बने उगना


कवि विद्यापति पक्के शिवभक्त थे. कहते थे जो भी कविताई है शिवजी का प्रसाद है. भोले बाबा तो शीघ्र ही प्रसन्न हो जाने वाले हैं सो विद्यापति की निस्स्वार्थ सरल सहज भक्ति से बड़े प्रसन्न हो गए.
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शिवजी तो ऐसे रीझ गए कि उनका विद्यापति के बिना मन ही न लगता. एक दिन शिवजी एक निपट निरक्षर और गंवार का वेष बनाकर विद्यापति के घर आ गये.
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विद्यापति को शिवजी ने अपना नाम उगना बताया कहा कि उन्हें अपने साथ रख लें, वह उनकी सेवा टहल कर दिया करेंगे. विद्यापति खुद गरीब थे उगना को नौकरी पर कैसे रखते !
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पर उगना ने तो जिद ही पकड़ ली. सिर्फ दो वक्त के भोजन पर तैयार हो गया. पर विद्यापति के लिये तो यह भी कम मंहगा सौदा न था. पर विद्यापति की पत्नी को यह सौदा मंजूर था.
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उन्हें लगता था कि उनके घर भी नौकर रहेगा तो समाज में थोड़ी उनकी इज्जत बढेगी और परिश्रम घटेगा और नौकर मांग भी क्या रहा है ? पत्नी की बात मानकर विद्यापति ने उगना को नौकरी पर रख लिया.
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विद्यापति का नाम राजदरबार तक था. एक बार राजा ने बुलाया तो विद्यापति उगना को साथ लेकर साथ राजा के दरबार को चले. वीरान सुनसान रास्ता था. उससे होकर चले.
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गर्मी के वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा लेकिन आस-पास पानी मिलने का आसार न था. ऐसा लगने लगा कि प्यास के बिना प्राण ही निकल जाएंगे.
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विद्यापति ने उगना से कहा- कहीं से पानी लाओ नहीं तो मैं प्यासा ही मर जाऊंगा. उगना बने भगवान शिव को तो पता ही था कि यहां दूर-दूर तक कहीं पानी नहीं मिलने वाला.
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विद्यापति की नजरों से हटकर कुछ दूर गए और वहां अपनी जटा खोलकर एक लोटा गंगाजल भर लाए. विद्यापति ने जब शीतल जल पिया तो उन्हें गंगा जल का स्वाद लगा.

वह आश्चर्यचकित हुए कि इस बियाबान में ऐसा ताजा, मीठा और शीतल जल कहां से आया जिसका स्वाद गंगाजल जैसा है. विद्यापति को उगना पर संदेह हो गया कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ही हैं.
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अतः उन्होंने उगना से वास्तविक परिचय पूछा. उगना ने कहानी बनानी शुरू की तो विद्यापति जिद करने लगे. उगना ने भी न स्वीकारने की ठान ली थी.
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इस पर विद्यापति ने उगना को हे भोलेनाथ ! कहकर पुकारा और उनके पैर पकड़ लिए. उगना छुड़ाता रहा, लेकिन विद्यापति छोड़ते न थे. हारकर उगना को अपने वास्तविक स्वरूप में आना पड़ा.
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उगना के स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गये. विद्यापति ने स्तुति की. गिले-शिकवे कि हे प्रभु आपसे सेवा कराकर जो पाप लिया है उससे तो जीवन ही नष्ट हो गया.
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शिवजी ने कहा मुझे उसमें बड़ा सुख आया. आप दोषमुक्त हैं. फिर बोले – मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर ही रहना चाहता हूं लेकिन किसी से मेरा यह रूप मत बताना.
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विद्यापति को अचरच हुआ पर भोलेबाबा का आदेश कैसे टालते. भेद छुपाने को राज़ी हो गये. उनको तो बिना मांगे संसार की सबसे अनमोल वरदान मिल चुका था. शिवजी सदैव साथ रहें और क्या चाहिए.
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उगना और विद्यापति पहले की ही तरह रहने लगे. एक दिन विद्यापति की पत्नी सुशीला ने उगना को कुछ काम दिया. उगना ने उसे पूरा किया लेकिन सुशीला उससे संतुष्ट न हुईं.
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सुशीला इससे इतनी नाराज हुई कि आव देखा देखा न ताव चूल्हे से जलती लकड़ी निकाल कर लगी उगना बने शिवजी की पिटाई करने. विद्यापति ने जब यह दृश्य देख तो बेचैन हो गए.
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अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा- अरे मूर्ख ये साक्षात शिवजी हैं. इन्हें जलती लकड़ी से मार रही हो. नरक् जाओगी. विद्यापति के मुंह से यह निकलते ही शिवजी वहां से अंतर्धान हो गये.
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इसके बाद तो उगना बने शिवजी को विद्यापति पागलों की भांति उगना-उगना कहते हुए हर जगह ढूंढने लगे. भक्त की ऐसी दशा देखकर परम दयालु महादेव को दया आ गयी.
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प्रकट होकर विद्यापति से कहा- अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता. मेरा भेद प्रकट हो गया है. उगना रूप के प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिवलिंग के रूप तुम्हारे पास विराजमान रहूंगा.
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इतना कहकर शिवजी अपने लोक लौट गये और उस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हो गया. उगना महादेव का प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में बिहार के मधुबनी के भवानीपुर गांव में स्थित है.

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