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भक्ता श्रीवारमुखीजी

भक्ता श्रीवारमुखीजी


एक वेश्या भक्ता थी। उसका घर धन-सम्पति से भरा था परन्तु वह किसी काम का न था, क्योंकि भक्त भगवान की सेवा में नहीं आ रहा था। एक दिन एक विशाल सन्त मंडली रास्ते-रास्ते जा रही थी। सायंकाल हो रहा था, विश्राम योग्य स्थान की आवश्यकता थी।

वेश्या के घर के सामने छाया युक्त, स्वच्छ सुन्दर स्थान देखकर संतों के मनको अच्छा लगा। सभी ने यत्र-तत्र अपने ठाकुर पधरा दिये, आसन लगा लिये। अच्छी ठौर देखकर ठहर गए ,उनके मन में धन का लोभ कदापि न था। इतने में ही वह वेश्या आभूषणों से लदी हुई बाहर द्वार पर आई।

हंसों के समान स्वच्छ चित्त वाले दर्शनीय सन्तों को देखकर वह मन में विचारने लगी- आज मेरे कौनसे भाग्य उदय हो गए? जो यह सन्त गण मेरे द्वार पर विराज गये। निश्चय ही इन्हें मेरे नाम या जाति का पता नहीं है। इस प्रकार वह सोच विचार कर घर में गई और एक थाल में मुहरें भरकर ले आई। उसे महंतजी के आगे रखकर बोली- 'प्रभो ! इस धन से आप अपने भगवान का भोग लगाइये।' प्रेमवश उसकी आँखों में आँसू आ गये।

मुहरें भेंट करती देख कर श्रीमहन्तजी ने पूछा- 'तुम कौन हो ,तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ है?' इस प्रश्न को सुनकर वह वेश्या चुप हो गई। उसके चित्त में बड़ी भारी चिंता व्याप्त हो गई। उसे चिन्तित देख कर श्रीमहन्तजी ने कहा कि तुम नि:शंक हो कर सच्ची बात खोल कर कह दो, मनमें किसी भी प्रकार की शंका न करो। तब 'मैं वेश्या हूँ', ऐसा कहकर वह महन्तजी के चरणों में गिर पड़ी।

फिर सँभलकर प्रार्थना की- 'प्रभो! धन से  भण्डार भरा हुआ है। आप कृपा कर इसे स्वीकार कीजिये। यदि आप मेरी जाति का विचार करेंगे और धन को नहीं लेंगे,तब तो मुझे मरी हुई समझिये, मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।'

तब श्रीमहन्तजी ने कहा- 'इस धन को भगवान की सेवा में लगाने का बस यही उपाय मेरे हाथ में है और वह यह कि- इस धन के द्वारा श्रीरंगनाथजी का मुकुट बनवाकर उन्हें अर्पण कर दो। इसमें जाति बुद्धि दूर हो जायगी। श्रीरंगनाथ जी इसे स्वीकार करेंगे।'

वेश्या बोली- 'भगवन् ! जिसके धनको ब्राह्मण छूते तक नहीं हैं, उसके द्वारा अर्पित मुकुट को श्रीरंगनाथजी कैसे स्वीकार करेंगे?'

महन्तजी ने कहा- 'हम तुम्हें विशवास दिलाते हैं कि वे अवश्य ही तुम्हारी सेवा स्वीकार करेंगे। इस कार्य के लिए हम तब तक यहीं रहेंगे, तुम मुकुट बनवाओ।'

वेश्या ने अपने घर का सब धन लगाकर सुन्दर मुकुट बनवाया। अपना श्रंगार करके थाल में मुकुट को रखकर वह चली। सन्तों की आज्ञा पाकर वह वेश्या नि:संकोच श्रीरंगनाथजी के मन्दिर में गई ,पर अचानक ही सशंकित हो कर लौट पड़ी, अपने को धिक्कारने लगी क्योंकि उसे संयोगवश मासिक-धर्म हो गया था वह अपवित्र हो गई थी। सन्तों ने संकोच का कारण पूछा। उसने बताया कि- 'मैं अब जाने योग्य नहीं हूँ।'

तब भक्तवत्सल श्रीरंगनाथजी ने वेश्या की दैन्यता एवं प्रेम को देख कर अपने पुजारियों को आज्ञा दी- 'इसे ले आओ और यह अपने हाथ से हमें मुकुट पहनावे।'

ऐसा ही किया गया, जैसे ही उसने हाथ में मुकुट लेकर पहनाना चाहा, वैसे ही श्रीरंगनाथजी ने अपना शिर झुका दिया और मुकुट को धारण कर लिया। इस चरित्र से भक्त-भगवान की मति रीझ गई। पतित-पावनता देख कर लोग भक्त-भगवान की जय-जयकार करने लगे।

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