गोस्वामी श्री रामदास जी काठिया -(वृन्दावन)
कालावधि (1820-1910)बाबा अधिक समय वृंदावन में व्यतीत करना चाहते। भाद्रपद में बाबा जमात के साथ चौरासी कोस की परिक्रमा करते। बाबा जैसे शक्तिशाली, पराक्रमी और शासन प्रिय महात्मा थे। वैसे ही परम क्षमाशील भी थे । आश्रम में एक रसोईया पुष्कर दास बड़ा लोभी स्वभाव का था। उसको भ्रम हो गया कि बाबा के कमर में जो लकड़ी का आडबन्ध है उसमें स्वर्ण की मोहरें छुपा रखी है। उसने मोहरों को प्राप्त करने के लिए दो बार बाबा को मारने का प्रयास किया। लेकिन सफल नहीं हो सका। इस बार उसने दो तोले असैनिक विष रोटी में मिलाकर बाबा को खिला दिया। बाबा को बहुत कष्ट हुआ। पेट फूल जाने के कारण आडबन्ध काटना पड़ा। आडबन्ध कटते ही पुष्कर दास का सारा भ्रम दूर हो गया। संतदास जी ने कहा -बाबा को आश्रम से बाहर निकाल दें। लेकिन स्वयं लज्जित होकर पुष्करदास आश्रम से चला गया। बाबा कुछ समय स्वस्थ हो गए। बाबा के लिए तो रोटी में विष तो आटे में नमक के समान था। बाबा शिष्यों से कहते- रात्रि के चतुर्थ प्रहर में सोना नही (2) भीतर से काम करना (3) सदा शुक्ल रहना।
एक दिन आश्रम के ठाकुरजी एवं किशोरीजी की शोभा यात्रा वृन्दावन में निकाली गयी। सबने देखा कि बाबा के रोम रोम से स्वेद निकल रहा है। सन्तदास पंखा कर रहे है। लेकिन स्वेद बन्द हो नही हो रहे। तब बाबा ने कहा - संतदास ये पसीना नही, एक प्रकार का प्रेमज्वर है। आज किशोरी जी के विग्रह के चारो और ब्रज गोपिकाओं के दर्शन हुए इसलिए प्रेमज्वर हो गया। ऐसा पहले कई बार हो चुका है। बाबा नित्य विहार की लीला में डूबे रहते।
एक दिन बाबा ने सेवक रामफल से जल मांगा। पानी पीकर बोले- तू जाकर सो जा। हम भी अब जायेगे। यह तिथि माघ मास की अष्टमी मध्य रात्रि बाबा पद्मासन लगाकर युगल का ध्यान करते हुए नित्य सेवा में चले गए। आंगन में दिव्य प्रकाश देखकर दो सेवक बाबा के कक्ष में गये तो देखा बाबा पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है लेकिन श्वास प्रश्वास बन्द है। बाबा के वियोग में आश्रम की गाय अश्रु प्रवाहित कर रही थी। औरों की तो क्या कहें आश्रम के ठाकुर राधा माधव जी के युगल नयन कमलों से अविरल 12 दिनों तक अश्रु प्रभावित होते रहे। बाबा के उत्सव होने के बाद बंद हुए। निरंतर अश्रु प्रवाहित होने से श्री जी के नेत्र विरूप होने के कारण दूसरे नेत्र लगाए गए । श्री राम दास जी महाराज जैसे महापुरुष जगत मैं जीवो को जग जंजाल से मुक्त कराकर प्रभु की भक्ति करने में सलगन कराने के लिए आते हैं । साथ ही साथ साधको के लिए एक पथ का निर्माण कर जाते हैं। जिस पथ पर चलकर साधु प्रभु की प्राप्ति कर सकें।
यहीं पर श्री रामदास जी का चरित्र विश्राम लेता है आगामी अंक में हम श्री ब्रजमोहन दास जी बड़ी सूरमा कौंच जी के चरित्र का गुणगान करेंगे।
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