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"श्री रूप गोस्वामी जी"

"श्री रूप गोस्वामी जी"

इनका जन्म 1493 ई (तदनुसार 1415शक.सं.) को हुआ था. इन्होंने २२ वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम त्याग कर दिया था. बाद के 51 वर्ष ये ब्रज में ही रहे. इन्होंने श्री सनातन गोस्वामी से दीक्षा ली थी. इन्हें शुद्ध भक्ति सेवा में महारत प्राप्त थी, अतएव इन्हें भक्ति-रसाचार्य कहा जाता है.
ये गौरांग के अति प्रेमी थे. ये अपने अग्रज श्री सनातन गोस्वामी सहित नवाब हुसैन शाह के दरबार के उच्च पदों का त्याग कर गौरांग के भक्ति संकीर्तन में हो लिए थे.
इन्हीं के द्वारा चैतन्य ने अपनी भक्ति-शिक्षा तथा सभी ग्रन्थों के आवश्यक सार का प्रचार-प्रसार किया. महाप्रभु के भक्तों में से इन दोनों भाइयों को उनके प्रधान कहा जाता था. यू तो सनातन जी बड़े थे,और उनका भक्ति-ज्ञान भी अपार था, परन्तु फिर भी रूप जी उनसे भी आगे थे, इसलिए गौडीय संप्रदाय में सभी "रूप-सनातन" कहते थे, सनातन-रूप नहीं कहा जाता था.
सन 1564 ई (तदा० 1486 शक. की शुक्ल द्वादशी) को 73 वर्ष की आयु में इन्होंने परम धाम को प्रस्थान किया.वृंदावन में "श्रीराधा दामोदर मंदिर" , श्री रूपगोस्वामी जी सेवाकुंज के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे. मन्दिर के उत्तर भाग में श्रीपाद रूपगोस्वामी की भजन-कुटी और समाधि मन्दिर स्थित हैं. पास ही श्रीभूगर्भ गोस्वामी की समाधि है.
श्रीरुप गोस्वामीजी सेवाकुञ्ज के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे. यहीं पर श्री रूप गोस्वामी ने श्री
"भक्तिरसामृतसिन्धु", "उज्जवलनीलमणि " एवं अन्यान्य भक्ति ग्रंथों का संकलन किया . सन् 1541 में भक्तिरसामृतसिन्धु की रचना समाप्त हुई. इसके एक वर्ष बाद सन् 1542 में रूप गोस्वामी ने जीव गोस्वामी को पृथक् रूप से सेवा करने के लिए राधादामोदर की जुगलमूर्ति प्रदान की.
प्रसंग १. - राधाकुण्ड के पश्चिम में झूलनतला है.एक समय श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी राधाकुण्ड की उत्तर–पूर्वी दिशा में श्रीरघुनाथदास गोस्वामी की भजनकुटी के निकट बैठे हुए कृष्ण कथा में विभोर हो रहे थे.
श्रीसनातन गोस्वामी ने श्रीरूप गोस्वामी से पूछा – रूप ! आजकल क्या लिख रहे हो?
श्रीलरूप गोस्वामी स्वरचित 'चाटुपुष्पाञ्जलि:' नामक स्तोत्र उनके हाथों में दे दिया. उसका पहला श्लोक था–
नव–गोरोचना–गौरीं प्रवेरेन्दीवराम्बराम्।
मणि–स्तवक–विद्योति–वेणीव्यालग्ङणाफणां।।
श्रीसनातन गोस्वामी ने उसे पढ़कर कहा –रूप! तुमने 'वेणीव्यालग्ङणाफणा' पद के द्वारा राधिका की लहराती हुई काली बंकिम वेणी की तुलना विषधर काली नागिन से की है. राधिका तो सर्वगुण सम्पन्न, परम लावण्यवती, सुकोमल एवं परम मधुर कृष्ण की प्रिया हैं.उनकी सुन्दर वेणी की यह उपमा मुझे रूचिकर प्रतीत नहीं हो रही हैं.
श्रीरूप गोस्वामी ने मुस्कुराते हुए नम्रतापूर्वक इसमें संशोधन करने के लिए प्रार्थना की. श्रीसनातन गोस्वामी को उस समय अन्य कोई उपमा सूझी 'पीछे संशोधन करूँगा' ऐसा कहकर वे इसी विषय की चिन्ता करते हुए वहाँ से विदा हुए.
जब वे कुण्ड की पश्चिम दिशा में इस स्थल पर पहुँचे, तो उन्होंने कदम्ब वृक्ष की डालियाँ पर एक सुन्दर झूले पर एक गोपकिशोरी की झूलते हुए देखा.उसकी सहेलियाँ मल्लार राग का गायन करती हुई उसे झुला रही थीं.श्रीसनातन गोस्वामी ने उस झूलती हुई किशोरी की लहराती हुई काली वेणी पर लहराती हुई काली नागिन को देखा.वे उसे बचाने के लिए उधर ही दौड़ते हुए पुकारने लगे– लाली! लाली! सावधान तुम्हारी वेणी पर काली नागिन है.
किन्तु, जब निकट पहुँचे तो देखा कुछ भी नहीं है.वहाँ न किशोरी है न सखियाँ हैं और न झूला.वे उस दृश्य का स्मरणकर आनन्द से क्रन्दन करने लगे और उल्टे पाँव रूप गोस्वामी के पास पहुँचे और बोले– रूप! तुम्हारी उपमा सर्वांगसुन्दर है.किशोरीजी ने मुझ पर अनुग्रह कर अपनी बंकिम वेणी का स्वयं ही दर्शन कराया है.उसमें संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं हैं.
राधा दामोदर जी का प्राकट्य
प्रसंग २- श्री जीव गोस्वामी वृन्दावन में अपने गुरु श्री रूप गोस्वामी के अनुगत होकर भजन में तल्लीन रहते थे . एक समय उनके हृदय में ठाकुर श्री दामोदर जी का विरह भाव जाग उठा. इस भाव में आतुर रहने के कारण वे क्षीण-काय (दुबले) होने लगे . किसी भी कार्य में उनका मन नहीं लगता था, हमेशा नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहती रहती थी. भगवान श्री कृष्ण के दर्शन की लालसा दृढ़तर होने लगी. ठाकुरजी से जीव की यह दशा सहन नहीं हुई और उन्होंने अदभुत ढंग से कृपा की.
एक समय श्री रूप गोस्वामी शयन कर कर रहे थे. उसी समय स्वप्न में उनको श्री कृष्ण के दर्शन हुए कितना अदभुत रूप था प्रभु का.
प्रभु हँसते हुए श्री रूप गोस्वामी से बोले
- " तुम मेरे दामोदर विग्रह को अपने हाथों से बनाओ.
श्रीरूप गोस्वामी बोले - " मैं आपके दामोदर विग्रह को कैसे बना सकता हूँ ? मैंने कभी भी अपने हाथों से छोटे से पत्थर को नहीं तोड़ा है तो फिर कैसे आपके सुन्दर श्री विग्रह दामोदर का मैं निर्माण कर सकता हूँ ?
प्रभु ने कहा - कि जैसे भी हो, तुम मेरे विग्रह का अपने हाथों से ही निर्माण करो, कारण - मैं तुम्हारे हाथों से ही प्रकट होना चाहता हूँ. मेरे उस दामोदर विग्रह का निर्माण करके तुम अपने प्रिय शिष्य एवं मेरे अति प्रिय भक्त जीव को प्रदान करना.
उसके द्वारा ही मैं आराधित और पूजित होना चाहता हूँ. वह मेरा अति ही प्रिय भक्त है. प्रभु ने अपने दामोदर विग्रह को किस प्रकार और किस रूप में निर्माण करना है, श्री रूप गोस्वामी को बताया और उस विग्रह के स्वप्न में ही दर्शन कराये तत्पश्चात् श्री रूप गोस्वामीजी की निद्रा भंग हो गयी.
श्री रूप गोस्वामी को यह भली-भाँति बोध हो गया की प्रभु भक्तों के ऊपर कृपा करने के लिए ही प्रकट होते हैं. अगर वो स्वयं प्रकट होना चाहते हैं तो उनको कौन रोक सकता है ? श्री रूप गोस्वामी जी समझ गये की वह तो केवल निमित्त मात्र हैं. वास्तविकता तो यह है कि प्रभु स्वयं ही प्रकट होंगे.
इस प्रकार विचार करके वे यमुना जी में स्नान करने गये. स्नान करके आते वक्त उन्हें एक काले रंग का सुलक्षण शिलाखंड प्राप्त हुआ. उस शिलाखंड को लाकर वे मूर्ति निर्माण में लग गये. मूर्ति निर्माण कार्य बड़ा अदभुत था.
भगवान दामोदर का प्रकट कार्य माघ शुक्ला दशमी को पूरा हुआ उस दिन समस्त भक्त्वृन्दों एवं गोस्वामीगणों के सामने श्री रूप गोस्वामीजी ने अपने शिष्य श्रीजीव को भगवान दामोदर का विग्रह सेवा हेतु प्रदान किया, इस पावन दिवस को श्री राधा दामोदर मन्दिर में सिंहासन यात्रा के रूप में मनाया जाता है. श्रीरूप गोस्वामी ने ठाकुरजी को श्री सिंहासन पर विराजमान कराया एवं समस्त वैष्णवजनों ने संकीर्तन आरंभ किया जो कई दिनों तक निरंतर चलता रहा.
श्रीगोविंद देव जी का प्राकट्य
प्रसंग ३ - श्रीरूप गोस्वामी, श्रीचैतन्य महाप्रभु के आदेश से शास्त्र-प्रमाण अनुसार लुप्त तीर्थों को प्रकट करना चाहते थे . शास्त्रों में उल्लेख था कि महाराज बज्रनाभ द्वारा स्थापित "श्रीगोविन्ददेव जी" वृन्दावन के योगपीठ में विराजमान हैं. रूप गोस्वामी प्रतिदिन पञ्चकोसी वृन्दावन की परिक्रमा भी करते थे और ब्रज के वनों, उपवनों और ग्रामों में घूम-घूम कर योगपीठ को ढूंढा करते.
वे हर समय इसी चिंता में रहते थे की मेरे प्रभु कहाँ हो सकते हैं और उन्हीं के प्रेम में रोते रहते थे. एक दिन परिक्रमा करते समय श्रीगोविन्द विग्रह की चिंता करते-करते बड़े अधीर हो गए तथा यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर सोचने लगे- भगवान की खोज करने की शक्ति मनुष्य में कहाँ? सूर्य जैसे किसी कि चेष्टा से नहीं, स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. यह सोचते-सोचते वे मन ही मन, "हा, गोविन्द, हा, गोविन्द!" कह इष्टदेव से प्रार्थना करने लगे. उनके नेत्रों से अश्रुधार प्रवाहित होने लगी.
उसी समय एक परम सुन्दर ब्रजवासी गोप बालक भी परिक्रमा करते करते उधर से निकला. और मधुर स्वर में उनसे बोला-"स्वामीजी, आप उदास क्यों बैठे हैं?" पहले तो श्रीरूप गोस्वामीजी ने कुछ नहीं कहा. किन्तु बालक के बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने अपने ह्रदय की व्यथा कह सुनाई.
इस पर बालक ने कहा-" आप चिंता बिल्कुल न करें. मैं जो कहता हूँ उसे सुनें. वृन्दावन में केशीतीर्थ के "गोमाटिला" नाम से जो स्थान प्रसिद्ध है, वही योगपीठ है. वहाँ प्रतिदिन पूर्वाह्न में एक श्रेष्ठ गाय आती है. बड़े प्रेम और उल्लास से अपने थनों के दूध से उस स्थान को सींच जाती है . गोविन्ददेव वहीं गुप्त रूप से विराजमान हैं. चलो मैं तुम्हें उस स्थान पर लिए चलता हूँ". उस स्थान पर उन्हें ले जाकर व्रजवासी अंतर्ध्यान हो गया.
श्री रूप गोस्वामी को इस रहस्य को समझने में देर न लगी. श्री रूप गोस्वामी उस बालक के रूप और मधुर बोली को स्मरण कर मुर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े. ब्रह्य ज्ञान होने पर उनके हृदय में आनंद नहीं समा रहा था और आनंद अश्रु बहाते वे पास की व्रजवासियों की बस्ती में गये और उन्हें यह शुभ संवाद दिया.
व्रजवासियों ने मिलकर बड़े उल्लास के साथ उस टीले पर दुग्ध-धारा से भीगे स्थान का खनन किया. कुछ दूर खुदाई करने के पश्चात गोविन्ददेव का श्रीविग्रह प्राप्त कर उनके आनन्द की सीमा न रही. उनकी हर्ष ध्वनि और गोविन्ददेव की जय-जय कार से आकाश गूंज गया.
रूप गोस्वामी ने शास्त्र वाक्य द्वारा प्रमाणित किया कि गोमाटिला द्वापर युग का योगपीठ है और श्रीविग्रह वज्रनाभ महाराज द्वारा प्रतिष्ठित और पूजित गोविन्ददेव हैं. गोविन्ददेव के प्राकट्य की बात सुन असंख्य नर-नारी दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे. कई दिन तक अपूर्व हर्षोल्लास के साथ महोत्सव होता रहा.
Radhe Radhe 

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