राम राज्य---निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के साथ राज्य
राम राज्य उस विकासशील राज्य को कहते हैं जो राम ने अयोध्या का राज्य ग्रहण करने के पश्चात करा ! उस राज्य में निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया थी जिसके सामने राजा और आम व्यक्ति एक सामान थे ! अन्याय किसी के साथ संभव नहीं था !
ऐसी मान्यता है कि यदि कोइ राजा ऐसी निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के साथ राज्य कर सके तो प्रकृति व् इश्वर उस राज्य को सुख और समृद्धि से परिपूर्ण रखता है, तथा जीवित माता पिता के सामने संतान कि भी मृत्यु नहीं होती !
राम राज्य ऐसा ही राज्य था , जिसमें धर्म और राजकीय व् सामाजिक न्याय में सामंजस्य था ! ऐसा राज्य केवल चक्रवर्ती सम्राट राम के समय में ही संभव हो पाया है !
ध्यान रहे कहने में और करने में अंतर होता है ! निष्पक्ष न्याय करना अत्यंत ही जटिल कार्य है ! अनेक ऐसे विषय होते हैं जिसमें समझोता करना पड़ता है !, स्वंम राम ने युद्ध की स्थिति में समझोते (बाली वध के समय) करें थे, लेकिन तब वोह राजा नहीं थे ! यह एक सन्देश है राम राज्य का कि निष्पक्ष न्याय अत्यंत जटिल है !
राजा को, कभी अपनी जनता को खुश रखने के लीये तो कभी राज्य से जुड़े होए शक्तिशाली व्यक्तियों के लीये, समझोते तो करने ही होते हैं !
आज भी धार्मिक गुरुजन यह प्रचार कर रहे हैं कि सीता का त्याग राम ने सिर्फ एक धोबी के कहने पर कर दिया ~~जो पूरी तरह से गलत है,
राम राज्य को परिभाषित ना करना पड़े....इसके लिए यह चाल है !
क्या सीता के अपहरण में आपको सीता का दोष कही विदित हूआ ?
यदि नहीं ....
तो सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा ?
और यदी करा तो ...
राम राज्य कि स्थापना क्या संभव थी ?
ध्यान रहे प्रकृति और इश्वर तो निष्पक्ष हैं,
यदी वोह उस राज्य को आशीर्वाद दे रहे हैं तो तभी संभव है जब निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया हो;
अर्थात महारानी सीता को भी न्याय का उतना ही अधिकार था जितना कि एक आम नागरिक को !
नहीं यह किसी तरह से संभव नहीं है कि जिस राम राज्य कि परिभाषा को ले कर हम सब चल रहे हैं उसमें सीता के साथ अन्याय हूआ हो !
राम राज्य उस विकासशील राज्य को कहते हैं जो राम ने अयोध्या का राज्य ग्रहण करने के पश्चात करा ! उस राज्य में निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया थी जिसके सामने राजा और आम व्यक्ति एक सामान थे ! अन्याय किसी के साथ संभव नहीं था !
ऐसी मान्यता है कि यदि कोइ राजा ऐसी निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के साथ राज्य कर सके तो प्रकृति व् इश्वर उस राज्य को सुख और समृद्धि से परिपूर्ण रखता है, तथा जीवित माता पिता के सामने संतान कि भी मृत्यु नहीं होती !
राम राज्य ऐसा ही राज्य था , जिसमें धर्म और राजकीय व् सामाजिक न्याय में सामंजस्य था ! ऐसा राज्य केवल चक्रवर्ती सम्राट राम के समय में ही संभव हो पाया है !
ध्यान रहे कहने में और करने में अंतर होता है ! निष्पक्ष न्याय करना अत्यंत ही जटिल कार्य है ! अनेक ऐसे विषय होते हैं जिसमें समझोता करना पड़ता है !, स्वंम राम ने युद्ध की स्थिति में समझोते (बाली वध के समय) करें थे, लेकिन तब वोह राजा नहीं थे ! यह एक सन्देश है राम राज्य का कि निष्पक्ष न्याय अत्यंत जटिल है !
राजा को, कभी अपनी जनता को खुश रखने के लीये तो कभी राज्य से जुड़े होए शक्तिशाली व्यक्तियों के लीये, समझोते तो करने ही होते हैं !
आज भी धार्मिक गुरुजन यह प्रचार कर रहे हैं कि सीता का त्याग राम ने सिर्फ एक धोबी के कहने पर कर दिया ~~जो पूरी तरह से गलत है,
राम राज्य को परिभाषित ना करना पड़े....इसके लिए यह चाल है !
क्या सीता के अपहरण में आपको सीता का दोष कही विदित हूआ ?
यदि नहीं ....
तो सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा ?
और यदी करा तो ...
राम राज्य कि स्थापना क्या संभव थी ?
ध्यान रहे प्रकृति और इश्वर तो निष्पक्ष हैं,
यदी वोह उस राज्य को आशीर्वाद दे रहे हैं तो तभी संभव है जब निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया हो;
अर्थात महारानी सीता को भी न्याय का उतना ही अधिकार था जितना कि एक आम नागरिक को !
नहीं यह किसी तरह से संभव नहीं है कि जिस राम राज्य कि परिभाषा को ले कर हम सब चल रहे हैं उसमें सीता के साथ अन्याय हूआ हो !
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